स्वास्थ्य पथ-पुरुषार्थ चतुष्टय प्राप्ति का प्रथम सोपान

अग्निकर्म । विद्धकर्म । अलाबु कर्म । पंचकर्म

कटिशूल, जानूशूल आदि अस्थि, संधि एवं स्नायुगत तथा कदर, चर्मकील आदि त्वकगत व्याधियों का अग्निकर्म, विद्धकर्म एवं अलाबुकर्म आदि समन्वित चिकित्सा पद्धतियों द्वारा उत्कृष्ट, प्रभावी एवं दीर्घकालिक परिणाम युक्त सफल आयुर्वेदिक उपचार

“पुरातन आयुर्वेदिक ज्ञान,  आधुनिक समन्वित दृष्टिकोण — वेदना शमन के उत्कृष्ट परिणामों की ओर एक प्रभावी कदम।”

हमारी सेवाये

अग्निकर्म चिकित्सा

अस्थिसंधिगत एवं त्वकगत ग्रन्थि आदि विकार के समूल नाश हेतु विशेष उपचार

विद्धकर्म चिकित्सा

वातजन्य एवं स्नायुगत विकारों हेतु विशेष उपचार।

अलाबुकर्म चिकित्सा

रक्तमोक्षण एवं वेदना शमन की प्रभावी चिकित्सा।

पंचकर्म चिकित्सा

शरीर शुद्धि एवं दोष संतुलन के लिए उत्तम चिकित्सा

अग्निकर्म (Agnikarma - Thermal Cautery)

अग्निकर्म- अग्नि के माध्यम से की जाने वाली चिकित्सा है। आयुर्वेद में इसे "क्षारसूत्रादिष्वपि प्रधानम्" माना गया है, अर्थात् जहाँ औषध या शल्य चिकित्सा काम नहीं करतीं, वहाँ अग्निकर्म स्थाई आराम देता है।

विधि:-

इसमें विशेष धातुओं (जैसे- पंचधात, स्वर्ण, या रजत आदि) से बनी शलाका को रक्त तप्त करके प्रभावित अंग के विशिष्ट बिंदुओं पर त्वचा को आंशिक रूप से दागा (Heat Stimulation) जाता है।

कार्मुक्ता:-

प्रभावित क्षेत्र में रक्त संचार (Blood Circulation) को तेजी से बढाकर वहाँ के वातदोष (जो दर्द का मुख्य कारण है) को शांत करता है, और मांसपेशियों की जकड़न को तुरंत दूर करता है।

मुख्य उपयोग:

o साइटिका (Sciatica) का दर्द
o एड़ी का दर्द (Heel Pain / Calcaneal Spur)
o घुटनों का गठिया (Osteoarthritis)
o गर्दन और पीठ का दर्द (Cervical & Lumbar Spondylosis)
o टेनिस एल्बो (Tennis Elbow) ​

विद्धकर्म (Viddhakarma - Acupuncture/Piercing Therapy)

विद्धकर्म-एक अत्यंत तीव्र गति से काम करने वाली दर्द निवारक चिकित्सा है, जिसे आयुर्वेद का 'एक्यूपंक्चर' भी कहा जा सकता है। इसमें सुश्रुत संहिता के सिद्धांतों के अनुसार काम किया जाता है।

विधि:-

इसमें बहुत ही पतली और कीटाणुरहित (Sterile) सुइयों (जैसे इंसुलिन सिरिंज या एक्यूपंक्चर नीडल्स) का उपयोग करके शरीर के प्रभावित अंग से जुड़े विशिष्ट ‘व्यध बिंदुओं’ (Points) पर सुई को कुछ मिलीमीटर तक चुभाया जाता है।

कार्मुक्ता:-

ई चुभाने से अवरुद्ध हुई ऊर्जा और वायु (Blocked Vata) का मार्ग खुल जाता है। इससे शरीर में प्राकृतिक एंडोर्फिन (Natural Painkillers) रिलीज होते हैं, जिससे मिनटों के भीतर दर्द में भारी कमी आती है।

मुख्य उपयोग:

o माइग्रेन और सिरदर्द
o फ्रोजन शोल्डर (कंधे की जकड़न)
o कमर दर्द और स्लिप डिस्क
o दांत का दर्द
o विभिन्न प्रकार के न्यूरोलॉजिकल दर्द (नसों का दर्द) ​

अलाबुकर्म (Alabukarma - Cupping Therapy)

अलाबुकर्म आयुर्वेद में रक्तमोक्षण की विधि है। आयुर्वेद में इसके लिए सूखे हुए लौकी (अलाबू) के खोखले फल का उपयोग करके वैक्यूम (Vacuum) बनाया जाता था। वर्तमान में इसकी जगह ग्लास कप या सक्शन कप (Cupping Therapy) का इस्तेमाल होता है।

विधि:-

प्रभावित स्थान पर पहले हल्के से बारीक कट्स (Scratches) लगाए जाते हैं (या बिना कट के भी किया जाता है, जिसे ड्राई कपिंग कहते हैं)। फिर अलाबू या कप को उस स्थान पर रखकर वैक्यूम बनाकर दूषित या अशुद्ध रक्त (Vitiated Blood) खिंचकर बाहर निकाला जाता है।

कार्मुक्ता:-

यह मुख्य रूप से पित्त और रक्त दोष को ठीक करने के लिए किया जाता है। यह त्वचा के नीचे जमा विषों को बाहर निकाल स्थानीय स्तर पर सूजन को कम करता है।

मुख्य उपयोग:

o त्वचा रोग (एक्जिमा, सोरायसिस, मुंहासे)
o स्थानीय सूजन
o मांसपेशियों में ऐंठन और भारीपन
o रक्त के दूषित होने से होने वाले दर्द

अलाबुकर्म (Alabukarma - Cupping Therapy)

पंचकर्म:-आयुर्वेद की एक अत्यंत महत्वपूर्ण और प्रसिद्ध चिकित्सा पद्धति है। यह शरीर को आंतरिक रूप से शुद्ध करने (Detoxification) और दोषों (वात, पित्त, और कफ) को संतुलित करने की एक गहन प्रक्रिया है। इसके अंतर्गत शरीर के विकारों और विषैले तत्वों (टॉक्सिन्स) को बाहर निकालने के लिए पाँच मुख्य क्रियाएँ की जाती हैं। वमन विरेचन, बस्ती, नस्य एवं रक्तमोक्षण ।

विधि:-

कार्मुक्ता:-

शरीर से संचित विषैले तत्वों (टॉक्सिन्स) को पूरी तरह बाहर निकालता है। • रोग प्रतिरोधक क्षमता (Immunity) को मजबूत करता है।

मुख्य उपयोग:

तनाव को कम करता है और मानसिक शांति देता है। • मेटाबॉलिज्म और पाचन क्रिया को बेहतर बनाता है। • उम्र बढ़ने की प्रक्रिया को धीमा करता है (Anti-aging) और त्वचा में चमक लाता है। ​

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